सोरायसिस

सोरायसिस एक अनुवांशिक त्त्वक व सन्धिगत रोग है।यह रोग शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता के अव्यवस्थित होने के कारण होता है।

होता क्या है।

हमारे शरीर में लगातार सृजन व विध्ंवस कि प्रक्रिया चलती रहती है। जिसमें नइकोशिकाओं का निर्माण होता रहता है व पुरानी कोशिकाओं को समाप्त कर दिया जाता है। यह प्रकिया शरीर द्वारा बड़े ही व्यवस्थित ढ़ंग से कि जाती है। जिस मात्रा में विध्ंवस होता है लगभग उसी मात्रा में सृजन भी होता है। जिससे कोशिकाओं का कुल योग लगभग एक जैसा रहता है व शरीर में समानता बनी रहती है। पंरतु किन्ही कारणों से जब यह प्रक्रिया हिल जाती है तो शरीर अव्यवस्थित तरीके से नई त्त्वचा की कोशिकाओं का निर्माण करने लगता है जो कि परत दर परत त्त्वचा पर जमा होने लगती है व उसका मूल संरचना में बदलाव करने लगती है। इस त्त्वचा की अव्यवस्थित परतों का जमाव ही सोरायसिस कहलाता है।

कारण

आयुर्वेद में इस रोग का वर्णन किटीभ के तौर पर आता है।यह एक प्रकार का क्षुद्र कुष्ठ है जो कि वात व कफ दोष के बढ़ने से होता है।मुख्य कारणों में यह रोग असात्त्म्य आहार विहार व विपरित भोजन के सेवन से होता है। हमारा शरीर भोजन से ही निर्मित होता है। जिस प्रकार का भोजन हम करेंगे उसी प्रकार की कोशिकाओं का निर्माण यह शरीर करता है।इसलिए अपने भोजन का सही चयन करना व सही मात्रा मे करना अती आवश्यक है।

चिकित्त्सा

एलोपैथिक चिकित्त्सा में इस रोग कि चिकित्त्सा सेलिसिलिक एसिड क्रिम लगा कर व एंटि एर्लिजक दवाओं द्वारा कि जाती है। रोग कि तीव्रावस्था में स्टिरायडस व सायटोटाक्सिक ड्रग्स जैसे मिथोट्रैक्सट का भी इस्तेमाल किया जाता है जो कि सद्ध लाभकारी होते है व रोगी को ज्ळद ही आराम अनुभव होने लगता है। परंतु इन दवाओं का इस्तेमाल बंद करते ही रोग अधिक अवस्था में वापस आने लगता है। रोगी को इन दवाओं का इस्तेमाल लगातार करते रहना पड़ता है। परंतु लंबे समय तक इन दवाओं के इस्तेमाल से इनके साइड एफेक्टस शरीर पर नज़र आने लगते हैं।मुख्यत यकृत खराब होने लगता है भूख लगना बंद हो जाता है। पेट में दर्द व भारीपन हो सकता है। अधिक मात्रा में टयुब लगाने से त्त्वचा पतली हो जाती है व ज़रा सी चोट लगने से खून आने लगता है।

आयुर्वेदिक चिकित्त्सा


1. आयुर्वेदिक मतानुसार सोरायसिस एक कष्ट साध्य रोग है।

2. पंचकर्म चिकित्त्सा द्धारा शरीर से बढ़े हुए दोष शरीर से निकाला जाता है तत्पश्चात् ही चिकित्सा कि जाती है।

3. सही नाड़ी का ज्ञान व धातु का निर्णय व प्रकृति का विचार सही चिकित्सा का प्रारूप है। आयुर्वेद चिकित्सा के मूल सिद्वांत में निदान का सही ज्ञान अति आवश्यक है।

4. यदि रोगी को सही समय पर सही निदान के साथ चिकित्सा कि जाये तो इस रोग से सर्वथा छुटकारा पाना संभव है। आयुर्वेद में उचित आहार विहार का बहुत अधिक महत्व है। सोरायसिस के रोगी को निम्न परहेज करने चाहिए।

5. अत्यधिक रूक्ष भोजन मसालेदार खाना व वातकारक खाद्व पदार्थ का सेवन वर्जित है।

6. मदिरा पान व रात्रि जागरण नहीं करना चाहिए।

7.मानसिक चिंता व अवसाद भी सोरायसिस के मुख्य कारणों मे से एक है।

रोगी को यदि त्वचा संबधि कोइ रोग हो तो उसे सही डाक्टर से मार्गदर्शन लेना चाहिए व अपने रोग का सही जानकारी लेना चाहिए ताकि रोग का निदान सही समय पर हो व यथोचित उपचार संभव हो सके।

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